Thursday, May 31, 2018

आधुनिक माधव

माधव 

खिला है पुष्प
एक धरा पर,
सुगंधित,पुष्पित और पल्लवित।
दुनियां को महकाना ख़ुद से,
उसको लगता सेवा धर्म।


आकर्षित है उससे माधव,
प्रेम मोह में पड़ा हुआ है।
दूरी अभी है बहुत शब्दों में,
कथनी करनी का अंतर भारी।


मन की विवशता समझ आ रही,
परिवार समाज की है  जिम्मेदारी।
उसको तो हँसना अच्छा लगता,
पर माधव को हँसते हुए वो।


इशारों में भी आज्ञाकारी
सेवा कर्म जीवन पर्यन्त।
एक लक्ष्य ही जीवन उनका,
सुगंधित कर दो दुनियां सारी।


सेवा के मीठे शब्द जाल में,
उलझ गया है अब तो माधव।
राधा की ज्योति हुई आलौकिक,
अंतर्मन को खीच रही है।



इजहार नहीं अब तक उनको,
इंकार के शायद शब्द नहीं है।
साथ उनका खुशनुमा लगता,
बातें उससे भी रोचक रहती।


पर किस्मत को कहां मंजूर,
यादों के सहारे जिंदगी कटती।
यादों को ज़रा सा समझा दो,
माधव को  इतवार चाहिए।


नैया के खेवनहार बने हो,
बीच मझधार से पार लगा दो।
पल भर में अपना कर लेने वाली,
अगले ही पल भूल जाती हो ।


मोह भ्रम के धूप छाव में,
खेल खिलाए बहुत पुष्प ने।
छोड़ दो माधव को राधिके,
मोह माया में जकड़ गया है।


विचलित और बेचैन हुआ है,
नैनो के जंगल में खो कर।
भावनाओं की पुकार को सुन लो,
शोर मचाएं कितना माधव।



मुक्ति चाहिए अब माधव को,
मोह माया में पड़ा हुआ है।

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