हमारा नेता
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हमने चुना अपना जन नायक,
उसको,
जिसका इतिहास काला है,
फिर भी
भरोसा दिखाते हुए
दिया एक और मौका।
क्योंकि उसने तमाम वादे किये,
अच्छे भाषण दिये,
राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रवाद के नई परिभाषायें दिये।
इन्होंने आह्वान किया
जाति से ऊपर उठकर
बांधना चाहा एक धर्म में
और जोड़ना चाहा
एक नयी राष्ट्रवाद से।
हमने अपनाते हुए
दिया
विशाल जन समर्थन।
क्योंकि हमारे विकल्प तलाश में थे,
हम स्वाद बदलता चाहते थे,
हम सच में
सबका विकास चाहते थे।
हम चाहते थे,
सबके लिए बेहतर
स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार।
मज़दूर किसानों की हालातो में
चाहते थे सुधार।
हमने उम्मीद लगाई थी,
बेटियों के पढ़ने की,
स्त्रीयों की सुरक्षा की।
हमने देखें थे
कई सारे ख्वाब
नये भारत के।
हम सोच रहे थे
अखंडता, एकता,
अभिव्यक्ति, आजादी के बारे में।
एक नाविक के सहारे
चलती हुई नाव में
बसे हुए हैं ये सब।
और उस नाव की लहर में
बह रहे थे हम सब।
नाव में बैठें हुए तमाम जन रक्षकों ने
फेक रखी थी योजनाओ की ढेर सारी रस्सियाँ
जिसका एक छोर थामे
हम बह रहे थे उस लहर में।
नही देखा हमने कि
रस्सी का दूसरा छोर किसके हाथ में है
नही जानते हैं हम उसे।
हमें तो बस वह नाविक दिख रहा था
जो योजनाओ की नयी नयी रस्सियाँ बना रहा था।
पर आज हम हार गये हैं
और जीत गई
वो तमाम ताकतें
जो हमें कमजोर बनाते हुए
बाट रही हैं
एक दूसरे से।
इनके पास
इंसानियत, मानवता, मोहब्बत
के लिए कोई जगह नहीं।
इन्हे दुःख, दर्द, और गरीबी से
कोई सारोकार नहीं।
ये बस दे सकते हैं हमें
नफरत, जाहिलता, और कट्टरता।
हमारे जीवन अब हमारे भरोसे है
हम नहीं बैठे सकते खोखले वादों से
हम एक हैं
हमें मिलाना होगा हाथ
हमें अपनी सुरक्षा ख़ुद करनी होंगी
देना होगा एक दूजे का साथ..!






