Sunday, May 17, 2020

हमारा नेता


हमारा नेता
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हमने चुना अपना जन नायक,
उसको,
जिसका इतिहास काला है,
फिर भी
भरोसा दिखाते हुए
दिया एक और मौका।
क्योंकि उसने तमाम वादे किये,
अच्छे भाषण दिये,
राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रवाद के नई परिभाषायें दिये।

इन्होंने आह्वान किया
जाति से ऊपर उठकर
बांधना चाहा एक धर्म में
और जोड़ना चाहा
एक नयी राष्ट्रवाद से।


हमने अपनाते हुए
दिया
विशाल जन समर्थन।
क्योंकि हमारे विकल्प तलाश में थे,
हम स्वाद बदलता चाहते थे,
हम सच में
सबका विकास चाहते थे।

हम चाहते थे,
सबके लिए बेहतर
स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार।
मज़दूर किसानों की हालातो में
चाहते थे सुधार।
हमने उम्मीद लगाई थी,
बेटियों के पढ़ने की,
स्त्रीयों की सुरक्षा की।

हमने देखें थे
कई सारे ख्वाब
नये भारत के।
हम सोच रहे थे
अखंडता, एकता,
अभिव्यक्ति, आजादी के बारे में।

एक नाविक के सहारे
चलती हुई नाव में
बसे हुए हैं ये सब।
और उस नाव की लहर में
बह रहे थे हम सब।
नाव में बैठें हुए तमाम जन रक्षकों ने
फेक रखी थी योजनाओ की ढेर सारी रस्सियाँ
जिसका एक छोर थामे
हम बह रहे थे उस लहर में।
नही देखा हमने कि
रस्सी का दूसरा छोर किसके हाथ में है
नही जानते हैं हम उसे।
हमें तो बस वह नाविक दिख रहा था
जो योजनाओ की नयी नयी रस्सियाँ बना रहा था।

पर आज हम हार गये हैं
और जीत गई
वो तमाम ताकतें
जो हमें कमजोर बनाते हुए
बाट रही हैं
एक दूसरे से।

इनके पास
इंसानियत, मानवता, मोहब्बत
के लिए कोई जगह नहीं।

इन्हे दुःख, दर्द, और गरीबी से
कोई सारोकार नहीं।
ये बस दे सकते हैं हमें
नफरत, जाहिलता, और कट्टरता।


हमारे जीवन अब हमारे भरोसे है
हम नहीं बैठे सकते खोखले वादों से
हम एक हैं
हमें मिलाना होगा हाथ
हमें अपनी सुरक्षा ख़ुद करनी होंगी
देना होगा एक दूजे का साथ..!

Saturday, September 14, 2019

"शोक सभा"

                            "शोक सभा"

वीर जवानों
कर्णधारों

चलो शोकसभा करें
पंरतु किस पर....?
समाज के डरते लोगो पर
आज इस तपती  धरती पर
या जल की अनुपलब्धता  पर!



शोकसभा होगी -
तृतीय विश्व्युद्ध के आगमन पर
मिसाइल के सफल परीक्षण पर,
और साम्प्रदायिकता पर |













दो मिनट का मौन रखेंगे-
निर्मम आतंकवाद पर
व्याप्त भ्रष्टाचार पर
बढ़ रहे बलात्कार पर!


श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे-
मरी हुई मानवता पर
शून्य हो गई संवेदना पर
बुद्धिमत्ता की निष्क्रियता पर!




दुःख व्यक्त करेंगे-
अपने आज पर
आने वाले कल पर
और लिखी गई इस कविता पर!

जिंदा हूँ मैं

मै सोचता हूँ समझाता हूँ और महसूस करता हूँ
इसी से मै जिन्दा हूँ,
जिन्दा होने का मतलब -
केवल सांसो के चलने से नहीं होता
कलम का चलना भी जरुरी होता है,
मुददतो बाद लिखना चाहता हूँ
एक अदद कविता -
जिसमे मजदूर और किसान
हासिये पर नहीं होंगे।
वे खुद अपनी फसल बोयेगे और काटेंगे
और खुद अपनी सरकार चलायेगे,
उन्ही का बैल -
उन्ही की फैक्ट्री होगी
अब सभी एक साथ हसिया चलाएंगे

और काट डालेंगे सारी बुराइयों को
और
हथोड़े से पीट पीट कर -
इस दुनिया को खूबसूरत बनाएंगे,
एक ऐसी दुनियां -
जहा सबके लिए प्यार - सम्मान होगा
अमन -चैन होगा
ये दुनियां
मोहब्बत की दुनिया कहलायेगी।


Thursday, May 31, 2018

आधुनिक माधव

माधव 

खिला है पुष्प
एक धरा पर,
सुगंधित,पुष्पित और पल्लवित।
दुनियां को महकाना ख़ुद से,
उसको लगता सेवा धर्म।


आकर्षित है उससे माधव,
प्रेम मोह में पड़ा हुआ है।
दूरी अभी है बहुत शब्दों में,
कथनी करनी का अंतर भारी।


मन की विवशता समझ आ रही,
परिवार समाज की है  जिम्मेदारी।
उसको तो हँसना अच्छा लगता,
पर माधव को हँसते हुए वो।


इशारों में भी आज्ञाकारी
सेवा कर्म जीवन पर्यन्त।
एक लक्ष्य ही जीवन उनका,
सुगंधित कर दो दुनियां सारी।


सेवा के मीठे शब्द जाल में,
उलझ गया है अब तो माधव।
राधा की ज्योति हुई आलौकिक,
अंतर्मन को खीच रही है।



इजहार नहीं अब तक उनको,
इंकार के शायद शब्द नहीं है।
साथ उनका खुशनुमा लगता,
बातें उससे भी रोचक रहती।


पर किस्मत को कहां मंजूर,
यादों के सहारे जिंदगी कटती।
यादों को ज़रा सा समझा दो,
माधव को  इतवार चाहिए।


नैया के खेवनहार बने हो,
बीच मझधार से पार लगा दो।
पल भर में अपना कर लेने वाली,
अगले ही पल भूल जाती हो ।


मोह भ्रम के धूप छाव में,
खेल खिलाए बहुत पुष्प ने।
छोड़ दो माधव को राधिके,
मोह माया में जकड़ गया है।


विचलित और बेचैन हुआ है,
नैनो के जंगल में खो कर।
भावनाओं की पुकार को सुन लो,
शोर मचाएं कितना माधव।



मुक्ति चाहिए अब माधव को,
मोह माया में पड़ा हुआ है।

Monday, April 23, 2018

बहन मै शर्मिंदा हूं

     'शर्मिंदा हूं'

बहन मै शर्मिंदा हूं
इंसानियत शर्मसार हुई है,
क्या कहूं कुछ कहा नहीं जाए
चुप रहूं तो रहा नहीं जाए!


पुरुष होने पर शर्म लग रहा,
स्त्री होने से डर लगता है!
ये मानवता की हार हुई है





मां मै शर्मिंदा हूं
इंसानियत शर्मसार हुई है
अरे राक्षसों
कलंकित करते क्यूं -
तुम ममता को
वहसी दरिंदो जरा विचारो,
दुनियां का भविष्य अंधकारमय है।
घर जाकर पूछो बीबी - बेटी से,
समाज में कितना जहर घुला है।




हवस के अंधो -
'जहर तुम खा लो'
मां - बहन को मार रहे हो!
हे स्त्री
मै शर्मिंदा हूं,
इंसानियत शर्मसार हुई है।
               
                          

Saturday, April 14, 2018

चूहे

         "चूहे"

 सफेद चूहे,
गुणी, ज्ञानी, व्यापारी बनकर
लुटेरों से आगे निकले हैं।
मेहनतकश के अन्न को खाकर
लीला खूब दिखाते हैं।

बहुत तेज है बनावटी चूहे,
घुसते खाद्य के बोरे में।
मोटे होकर वहीं हैं मरते,
करते नष्ट व्यवस्था को।
दूसरों का माल अपना समझकर
नीद हराम करते हैं।

अन्न को खाकर,
अन्न चुराते
पत्तल का भी मोह नहीं है।
सुरक्षा कैसे हो,
चूहेदानी से?
जब निकास द्वार
बहुत आसान हो।



दिल्ली को अंगूठा  दिखाकर
बस जाते हैं ये विदेश में।
बेच  के अपनी जमीन को
हो जाते हैं हवा हवाई।
क्या कह सकते इनका हाल
खूब गल रही इनकी दाल।

बिल्ली भी अब है अलसाई,
चोर चोर मौसेरे भाई।
खेतिहर भी अब ऊब गया है,
गेहूं की खलियानों से।
नहीं करेंगे पैदा गेहूं,
व्यवस्था रूपी खेतों में।
न हो अन्न ,न होंगे चूहे,
देखेगे मालिक फिर कौन?