Saturday, April 14, 2018

चूहे

         "चूहे"

 सफेद चूहे,
गुणी, ज्ञानी, व्यापारी बनकर
लुटेरों से आगे निकले हैं।
मेहनतकश के अन्न को खाकर
लीला खूब दिखाते हैं।

बहुत तेज है बनावटी चूहे,
घुसते खाद्य के बोरे में।
मोटे होकर वहीं हैं मरते,
करते नष्ट व्यवस्था को।
दूसरों का माल अपना समझकर
नीद हराम करते हैं।

अन्न को खाकर,
अन्न चुराते
पत्तल का भी मोह नहीं है।
सुरक्षा कैसे हो,
चूहेदानी से?
जब निकास द्वार
बहुत आसान हो।



दिल्ली को अंगूठा  दिखाकर
बस जाते हैं ये विदेश में।
बेच  के अपनी जमीन को
हो जाते हैं हवा हवाई।
क्या कह सकते इनका हाल
खूब गल रही इनकी दाल।

बिल्ली भी अब है अलसाई,
चोर चोर मौसेरे भाई।
खेतिहर भी अब ऊब गया है,
गेहूं की खलियानों से।
नहीं करेंगे पैदा गेहूं,
व्यवस्था रूपी खेतों में।
न हो अन्न ,न होंगे चूहे,
देखेगे मालिक फिर कौन?

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